शिक्षक पेशेवर विकास व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच कुछ कर गुज़रने की चाह

ज़ेबा जी कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय पुनहाना में उर्दू पढ़ाती हैं। मूलतः आगरा की रहने वाली ज़ेबा जी पिछले 11 वर्षों से केजीबीवी में कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की है। उनके पिता जी पेशे से डॉक्टर हैं और माताजी गृहिणी हैं। बारहवीं की पढ़ाई के बाद ज़ेबा जी ने Combined Pre Medical Test (CPMT) की परीक्षा पास की और एमबीबीएस में प्रवेश लिया। पहले वर्ष में ही मृत शरीर को देख ऐसा लगा कि शायद इस पेशे में बहुत आगे नही बढ़ पाएंगी इसलिए मेडिकल की पढ़ाई छोड़ कर घर आ गईं। माताजी ने फिर से पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। पढ़ाई के दौरान शादी करने का बहुत दबाव था पर उस समय पिताजी ने साथ दिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद शादी हुई पर ससुराल पक्ष के लोग नौकरी की लिए राजी नहीं थे। पर ज़ेबा जी अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं और नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं पास की।


जीवन के संघर्षों से हार न मानने वाली ज़ेबा जी माँ के रूप में बहुत ही अच्छी भूमिका निभा रही हैं। उनकी बेटी अभी नौ साल की है। वह जन्म से बोलने में सक्षम नहीं है और उसको उठने- बैठने व चलने में दिक्कत होती है। अपने दैनिक कार्यों में उसे लगातार मदद चाहिए होती है। घर परिवार के साथ- साथ उनकी बेटी की जिम्मेदारी उनके ऊपर है| ऐसे में ज़ेबा जी पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाने की बजाय उनके पति उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमेशा खड़े रहे। न सिर्फ उनकी नौकरी को ज़ारी रखने में सहयोग किया बल्कि घर की जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभाने में उनका हाथ बंटाया। तभी वह कहती हैं कि उनके दो नहीं चार हाथ हैं|


ज़ेबा जी का कहना है–”मेरी मां अशिक्षित थीं, पर उन्होंने मुझे हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैं शिक्षक सिर्फ उनकी वजह से बनी। मुझे लगता है एक शिक्षक ही बच्चों के सामने दुनिया को देखने का एक नया नजरिया विकसित करने में मदद करता है। शिक्षक ही बच्चों को क्या सही है और क्या गलत है इसको तय करने और अपने जीवन में लिए गए निर्णयों के प्रति जिम्मेदार बनाता है। इसीलिए मुझे लगता है शिक्षक होना सबसे बेहतरीन पेशा है। मेरी कक्षा में ज्यादातर बच्चियां बहुत ही वंचित परिवारों से आती हैं। मुझे लगता है बच्चे आपस में एक दूसरे से काफी कुछ सीखते हैं। इसलिए मेरा प्रयास ये होता है कि बच्चे मिल कर कुछ करें और एक दूसरे से सीखें। मैं ऐसा मानती हूं कि हर बच्चे में क्षमता है और हम शिक्षक उन्हें जीवन में कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी सोशल मोबिलिटी के लिए शिक्षा से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। हम कुछ शिक्षक मेवात के बाहर से हैं तो कभी कभी कुछ तत्व हमारे ऊपर अनावश्यक प्रश्न उठाते हैं। पर हमने अपने अच्छे काम के दम पर समुदाय का भरोसा जीता है। ऐसे वाकिए अब कम हो रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में स्वतालीम के माध्यम से ‘सहेली की उड़ान’ कार्यक्रम से जुड़कर मुझे ऐसा लगता है कि हम शिक्षक एक समूह के रूप में करीब आए हैं। हम एक दूसरे से सीखने और कुछ बेहतर करने के लिए उत्प्रेरित हुए हैं। हमारे अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ है और हम अब एक दूसरे से मदद लेने और सीखने के लिए ज्यादा खुले हैं।”


रेखा जी के जीवन के संघर्ष ज़ेबा जी से अलग हैं। अलीगढ़ की रहने वाली रेखा जी ने दसवीं तक को पढ़ाई अपने गांव के सरकारी स्कूल से की। बारहवीं की पढ़ाई पास के कस्बे में हुई। स्नातक की पढ़ाई के बाद उनकी शादी हो गई। शादी के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई नही छोड़ी और परास्नातक के बाद B.Ed. की पढ़ाई की। इसी दौरान दो बच्चे भी हुए पर ससुराल पक्ष ने बच्चों का खयाल रखा ताकि रेखा जी अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। एक दुखद सड़क दुर्घटना में रेखा जी ने अपने पति को खो दिया। दोनों बच्चे उस समय बहुत छोटे थे। इस बहुत ही कठिन दौर में भी रेखा जी ने अपना हौसला कम नही होने दिया। पढ़ाई जारी रखी और प्रतियोगी परीक्षा पास कर कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय पुनहाना में वार्डन के पद पर नियुक्त हुईं।

रेखा जी को लगता है शिक्षण ही एक मात्र ऐसा पेशा है जो बच्चों को न सिर्फ अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए तैयार करता है, बल्कि समाज और देश को भी बेहतर होने मे मदद करता है।

रेखा जी कहती हैं –”मैं एक वार्डन होने के साथ साथ बच्चों को भाषा भी पढ़ाती हूं। कोशिश करती हूं कि कक्षा में उनके साथ ज्यादा से ज्यादा बातचीत के माध्यम से विमर्श करूं। उनका ध्यान ऐसे मुद्दों पर ले जा सकूं जिनपर हम कम बातें करते हैं। बच्चियां खुल कर आत्मविश्वास से अपनी बात एक बेहतर समझ के साथ करें तो फिर हमारे शिक्षक होने का ध्येय पूरा हो जाता है। मेरी वजह से अगर एक बच्ची का जीवन भी बेहतर होता है तो मैं में मानूंगी मेरा शिक्षक होना सफल रहा। हर इलाके कि अपनी चुनौतियां होती हैं। मेवात की भी हैं। जागरूकता धीरे धीरे बढ़ रही है। समुदाय अपनी बच्चियों को बेहतर शिक्षा दिलाने में सहयोग कर रहा है। पिछले छह साल में नौकरी करते हुए मैने सीखा है कि पूरी शिद्दत और अच्छी मंशा के साथ किए गए आपके प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते। ‘सहेली की उड़ान’ कार्यक्रम के माध्यम से हम शिक्षकों का आपसी सौहार्द और सहयोग बढ़ा है। इसके माध्यम से ही मुझे सभी कस्तूरबा विद्यालय देखने का मौका मिला और मैने वहां से काफी कुछ सीख कर अपने विद्यालय में लागू करने की कोशिश की है। मुझे लगता है कि हर शिक्षक का लगातार सीखना और आगे बढ़ना बहुत जरूरी है। दुनिया तेजी से बदल रही है और इसको समझने के लिए हमें पढ़ना, लिखना और एक दूसरे से सीख कर आगे बढ़ना होगा।”

स्वतालीम फाउंडेशन और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद की साझेदारी के तहत ‘सहेली की उड़ान’ कार्यक्रम के अंतर्गत, मेवात जिले के पांच कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के शिक्षकों, वार्डन और प्रिंसिपल के साथ शिक्षक पेशेवर विकास के ऊपर काम कर रही है। हमारा मानना है कि शिक्षकों का अलग थलग होना शिक्षक पेशेवर विकास की सबसे बड़ी चुनौती है और इसलिए शिक्षकों का साथ में आना और एक दूसरे से सीखना शिक्षक पेशेवर विकास का सबसे बुनियादी काम है। शिक्षकों का समूह एक लर्निंग कम्युनिटी के रूप में हो और एक निश्चित अंतराल पर अकादमिक विमर्श हो, ये आपस में सीखने का सबसे बड़ा काम है। और इसके लिए शिक्षक साथियों का स्वप्रेरित होना बहुत जरूरी है। ये काम किसी दबाव के साथ नही हो सकता।

महामारी के दौर में स्वतालीम फाउंडेशन ने शिक्षक साथियों के साथ लगातार संवाद कायम रखा है। इन अकादमिक चर्चाओं के दौरान संविधान की प्रस्तावना, शिक्षा के उद्देश्यों को गहराई से समझने के साथ साथ इन मुद्दों पर भी बातचीत जारी है कि कैसे वर्तमान परिदृश्य में बच्चों के साथ कुछ ऑनलाइन टूल्स मसलन गूगल मीट, जूम, गूगल कलासरूम का इस्तेमाल कर बच्चों की पढ़ाई जारी रखी जा सके। शिक्षक साथियों का कहना है को माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल को समझ कर अब वो अपने आंकड़ों का बेहतर प्रबंधन भी कर पा रहे हैं।

कोई भी शिक्षक जब कुछ भी नया सीखता है तो वो उसको अपनी कक्षा में बच्चों के बीच प्रयोग करता है और इस प्रक्रिया में उसकी समझ और पैनी और गहरी होती है। वर्तमान परिदृश्य में ये सबसे बड़ी चुनौती है।

ऐसे समय में जब स्कूल लंबे समय से बंद हैं, ज़ेबा जी और रेखा जी को सबसे ज्यादा मलाल इसी बात का है कि वो जो कुछ भी नया सीख रहे हैं उसका पूरा इस्तेमाल बच्चियों के साथ नही हो पा रहे है। वर्तमान परिवेश में ये शायद कम हो संभव भी है। पर इन दोनों शिक्षकों को हमेशा से परिस्थितियों से डटकर लड़ने और विजय पाने की आदत है। हमें विश्वास है कि ये शिक्षकाएं बच्चियों तक पहुंचने और उनकी पढ़ाई में बेहतर सहयोग करने के कुछ नए रास्ते भी जल्दी ही निकालेंगी।

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